अध्यात्म दिखावा नहीं
मन में छल हो, हों षड्यंत्र,
हों शब्दों में तीखे बाण,
किसी का दिल दुखाकर फिर,
कैसा तीर्थ, कैसा भगवान?
किसी को नीचा दिखला देना,
भरी सभा में मान गिराना,
आँखों में आँसू देकर फिर,
मंदिर में जाकर शीश झुकाना?
व्रत रख लेना, उपवास करना,
तीर्थों के सौ फेरे लगाना,
प्याज़ लहसुन छोड़ भी देना,
क्या बस इतना धर्म निभाना?
अध्यात्म कोई वेश नहीं है,
जिसे जगत को दिखलाना है,
यह तो मन की निर्मलता है,
जिसे स्वयं में अपनाना है।
क्या खाया, क्या नहीं खाया,
इससे मन पावन कब होता?
मन में द्वेष अगर पलता हो,
तो पूजा से क्या फल होता?
सच्चा अध्यात्म प्रेम में बसता,
करुणा जिसकी पहचान,
किसी के आँसू पोंछ सको तो,
वहीं मिलेंगे तुम्हें भगवान।
कथनी नहीं, करनी बोलती,
कर्मों से पहचान,
जो कहते हो, करके दिखलाओ,
तभी मिलेगा जग में मान।
और मुझे चाहे जितना तोड़ो,
मैं फिर खुद को जोड़ूँगी,
प्रभु के प्रेम का हाथ पकड़कर,
हर बार फिर से उठूँगी।
मेरा उनसे रिश्ता ऐसा,
जिसे न जग को दिखलाना है,
मैं उन्हें प्रेम करूँ हृदय से,
बस इतना ही मेरा खज़ाना है।
कहे सुकन्या, धर्म न दिखावा,
न पूजा का अभिमान,
मन में प्रेम, कर्म में करुणा,
बस यही सच्चा अध्यात्म, यही भगवान। 🙏
© Sukanya Yogesh (2026)
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