01 September 2026

छोड़ दीजिए



✨ छोड़ दीजिए ✨


नाराज़ क्यों होना किसी से,

हर बात दिल लगाना छोड़ दीजिए

जो समझे न ख़ामोशी आपकी,

उसे बार-बार समझाना छोड़ दीजिए


काम से काम रखिए अपना,

हर रिश्ते को निभाना छोड़ दीजिए

जो रूठकर भी मुड़कर न देखे,

उसे हर बार मनाना छोड़ दीजिए


माफ़ कर दीजिए दिल से सबको,

मगर एहसान गिनाना छोड़ दीजिए

जो अपना होकर अपना न समझे,

उसे अपना बताना छोड़ दीजिए


बेचैन करे उसकी ख़ामोशी तो भी,

बार-बार आवाज़ लगाना छोड़ दीजिए

जिसे फ़िक्र होगी आपकी सच में,

उसे अपनी याद दिलाना छोड़ दीजिए


परवाह रहे तो दिल में रखिए,

हर बार उसे जताना छोड़ दीजिए

जहाँ क़दर न हो जज़्बातों की,

वहाँ दिल को दुखाना छोड़ दीजिए


कैसे भी बसर करे कोई अपना,

उस पर अपना हक़ जताना छोड़ दीजिए

कुछ रिश्ते दूर से अच्छे लगते हैं,

हर रिश्ता पास बुलाना छोड़ दीजिए


जो साथ रहे, उसे प्यार दीजिए,

जो जाना चाहे, उसे जाने दीजिए।

ज़िंदगी बहुत छोटी है दोस्तों,

हर बात का बोझ उठाना छोड़ दीजिए। ✨




© Sukanya Yogesh (2026)


All rights reserved.


No part of this poetry may be reproduced, distributed, or transmitted in any form or by any means, including photocopying, recording, or other electronic or mechanical methods, without the prior written permission of the author, except in the case of brief quotations used in reviews, articles, or academic work, with proper attribution.

18 August 2026

बस छोड़ दो



✨ बस छोड़ दो ✨

सारी उम्र तुम मज़बूत रहे,
देते रहे, सहते रहे,
हर किसी के सहायक बने,
हर उलझन को सुलझाते रहे।

जब भी कोई लड़खड़ाया,
तुमने उसका भार उठाया,
और तुम्हारा पहला ख़याल हमेशा यही रहा,
“मैं संभाल लूँगी… मैं कुछ रास्ता निकाल लूँगी।”

पर जीवन भी धीरे धीरे,
बदलते मौसम और बहती लहरों के साथ
एक बात समझाता है।

हर बात को ठीक करना ज़रूरी नहीं,
हर बात का उत्तर देना ज़रूरी नहीं,
हर उलझन को सुलझाना भी ज़रूरी नहीं।

हर बोझ तुम्हारे कंधों के लिए नहीं बना।
कभी कभी जीवन की सबसे बड़ी समझ बस इतनी सी है,
बस छोड़ दो।

अगर तुमने एक बार अपनी बात कही
और उन्होंने फिर भी नहीं सुनी,
तो उन्हें मनाने में
अपनी आत्मा को मत थकाओ।

एक बार और समझा दो,
फिर विश्वास के साथ पीछे हट जाओ।
अगर वे फिर भी समझना न चाहें,
बस छोड़ दो।

जब तुम्हारे बच्चे बड़े हो जाएँ
और अपने रास्ते स्वयं चुनें,
तो तुम्हारा प्रेम उनके मार्ग का दीपक बने,
पर उनकी राह का निर्णय नहीं।

प्यार से समझाओ,
स्नेह से मार्ग दिखाओ,
फिर एक कदम पीछे हट जाओ।

अपना जीवन चुनना उनका अधिकार है।
बस छोड़ दो।

अगर बहुत कोशिशों के बाद भी
तुम्हारा मन किसी के मन से न मिल पाए,
तो इसे अपनी हार मत समझना।

हर तरंग की अपनी आवृत्ति होती है,
हर आकाश तक हर स्वर नहीं पहुँचता।
रिश्तों को ज़बरदस्ती बाँधने से
केवल मन दुखता है।

जहाँ मन का मेल न हो,
बस छोड़ दो।

किसी की आलोचना के तीखे शब्दों को
अपने ऊपर से गुज़र जाने दो।
मन की शांति इतनी अनमोल है
कि उसे किसी की राय के लिए मत खोओ।

तुमने जीवन की कितनी सर्दियाँ देखी हैं,
कितने अनुभवों की माला पिरोई है।
फिर किसी और की सोच के कारण
अपने भीतर की धूप क्यों कम करना?

बस छोड़ दो।

जब परिणाम तुम्हारे हाथों से
बहुत दूर निकल चुका हो,
तो उसकी चिंता में स्वयं को मत जलाओ।

जो लिखा है, वह होकर रहेगा,
भले ही आज तुम्हें उसका अर्थ समझ न आए।
जिस हाथ ने तारों को थाम रखा है,
उसे आगे का रास्ता भी मालूम है।

बस छोड़ दो।

जब अपेक्षाओं का बोझ
तुम्हारे सीने को झुकाने लगे,
जब तुमसे इतना माँगा जाने लगे
जितना तुम उठा ही नहीं सकते,

तो उस दबाव को मुक्त कर दो।
अपनी आत्मा को थोड़ा विश्राम दो।

तुम जैसे हो,
अपने आप में पर्याप्त हो।

बस छोड़ दो।

अपनी यात्रा अपने ढंग से चलो,
अपनी सहज गति से चलो।
अपनी फसल की तुलना
किसी और के बगीचे से मत करो।

हर किसी की शक्ति अलग है,
हर किसी का मौसम अलग है।
गुलाब की तरह न खिलने से
कोई दूसरा फूल कम सुंदर नहीं हो जाता।

बस छोड़ दो।

तुम्हारे भीतर एक ऐसी संपत्ति है
जिसे कोई हानि तुमसे छीन नहीं सकती।
तुम्हारे अनुभवों का अनमोल सोना,
तुम्हारे जीवन की अर्जित समझ।

फिर हर दिन के लाभ और हानि से
अपनी कीमत क्यों आँकना?

तुम्हारा मूल्य पहले से ही तुम्हारे भीतर है।
बस छोड़ दो।

जो कुछ भी जीवन में घट रहा है,
उसमें कहीं न कहीं उसकी योजना है।

न कोई साँस व्यर्थ है,
न कोई पत्ता यूँ ही हिलता है,
न कोई क्षण उसकी दृष्टि से बाहर है।

जिसे बदल नहीं सकते, उसे स्वीकार करो।
जिसे बेहतर कर सकते हो, उसे बेहतर करो।
और जो तुम्हारे हाथों में नहीं है,
उसे प्रभु के हाथों में सौंप दो।

बस छोड़ दो।

और अगर ये शब्द भी
तुम्हारे मन तक नहीं पहुँचते,
अगर तुम्हें लगता है
कि ये बातें तुम्हारे लिए नहीं हैं,

तो इन्हें भी प्रेम से एक ओर रख देना।

बस एक आख़िरी बात,
और फिर पूर्ण मौन।

अगर यह संदेश तुम्हारे लिए नहीं है…

तो इसे भी… बस छोड़ दो। ✨



© Sukanya Yogesh (2026)

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JUST LEAVE IT



JUST LEAVE IT

 

All your days you stood strong, you gave and you bore 

Always the helper, the solver, the shore.

When others would stumble, you carried their weight,

And your first thought was always: I’ll figure it out, it can wait.

 

But life gently whispers, through seasons and tides 

Not everything needs to be fixed, or explained, or tied.

Not every burden was meant for your hands to retrieve.

Sometimes the truest of wisdom is simply: Just Leave It.

 

If they’ve heard your voice once, and they still turn away 

Do not break your spirit to make them obey.

Convince them twice, then release, and believe 

If they still will not see it… Just Leave It.

 

When your children grow tall and choose roads of their own 

Love lights their way, but let grace be their throne.

Guide them with kindness, then step back and breathe 

Choice is their birthright. Just Leave It.

 

If your heart cannot meet theirs, no matter how you try 

Not every frequency reaches every sky.

Forcing connection will only grieve 

Where harmony fails you… Just Leave It.

 

Let the critic’s sharp words pass over your head 

Peace is a treasure too precious to shred.

You’ve walked many winters, you’ve woven your wreath 

Why dim your own sunshine for someone’s belief? Just Leave It.

 

When the outcome lies far beyond where you can reach 

Stop worrying, dear heart, it is not yours to teach.

What is written will happen, though you may not perceive

The hand that holds stars knows. Just Leave It.

 

When the weight of expectation bows down your chest 

When “more than you can carry” becomes the request 

Release the pressure, let your spirit reprieve 

You are enough, as you are. Just Leave It.

 

Walk your own journey, at your own gentle pace 

Do not measure your harvest by another’s grace.

Different strengths, different seasons why grieve or conceive?

No flower is less because it does not bloom like the rose. Just Leave It.

 

You carry a wealth that no loss can erode 

The priceless gold of experience, the grace on your road.

Why weigh daily gains against what you believe?

Your worth is already held .....Just Leave It.

 

Whatever unfolds is woven by His design 

Not a breath, not a leaf, nor a moment outside.

Accept what you cannot change, improve what you can 

And surrender the rest to Lord's hand.

 

And if these words do not speak to where you abide 

Then take them gently, and set them aside.

One last truth, and then silence complete:

If this message is not yours… Just Leave It.

 

© Sukanya Yogesh (2026)

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15 August 2026

चलो सैनिकों, आगे बढ़ो

 


चलो सैनिकों, आगे बढ़ो 🇮🇳

चलो सैनिकों, आगे बढ़ो,
कदम कदम बढ़ाओ।
भारत माँ की रक्षा में,
अपना शीश चढ़ाओ।

आगे कदम बढ़ाया है,
तो पीछे नहीं हटाएँगे।
अगर गोली चली तो हम,
अपना सीना दिखलाएँगे।

दुश्मन चाहे लाख रोक ले,
हम रुकने न पाएँगे।
भारत माँ की आज़ादी का,
झंडा हम फहराएँगे।

नहीं डरेंगे गोली से हम,
नहीं किसी से हारेंगे।
अपनी धरती, अपनी माता,
उस पर जान भी वारेंगे।

चलो सैनिकों, आगे बढ़ो,
मिलकर कदम बढ़ाओ।
भारत माँ के वीर सपूतों,
अपना फ़र्ज़ निभाओ।

आँधी आए, तूफ़ाँ आए,
कदम नहीं रुक पाएँगे।
आगे कदम बढ़ाया है,
तो पीछे नहीं हटाएँगे।

दुश्मन को हम बता देंगे,
भारतवासी क्या होते हैं।
देश की खातिर जीते हैं,
देश की खातिर मरते हैं।

चलो सैनिकों, आगे बढ़ो,
विजय का गीत सुनाओ।
भारत माँ की जय बोलो,
तिरंगा ऊँचा लहराओ। 🇮🇳


✨ इस कविता के पीछे की कहानी

यह कविता मैंने कक्षा 7 में, लगभग 12 वर्ष की उम्र में लिखी थी। हमारी हिंदी शिक्षिका Mrs. Kirti Gupta ने हमें हरिवंश राय बच्चन जी की पंक्तियों “चल मर्दाने, सीना ताने…” से प्रेरणा लेकर भारत की स्वतंत्रता और देशभक्ति पर अपनी कविता लिखने की चुनौती दी थी।

उसी चुनौती से जन्मी थी “चलो सैनिकों, आगे बढ़ो।” ❤️

दुर्भाग्य से मेरी वह पुरानी डायरी बाद में गलती से फेंक दी गई, जिसमें मेरी कई बचपन की कविताएँ थीं। इस कविता की कुछ पंक्तियाँ आज भी मुझे याद हैं और कुछ हिस्सों को मैंने उन्हीं यादों और मूल भावना के आधार पर फिर से जोड़ा है।

आज इतने वर्षों बाद इसे पढ़ते हुए मुझे इसकी सरलता ही सबसे प्यारी लगती है। शब्द एक 12 साल की बच्ची के थे, लेकिन भावना सच्ची थी। ❤️

डायरी खो गई, लेकिन कुछ शब्द यादों में रह गए। ✨📖

जय हिंद! 🇮🇳
वंदे मातरम्! 🇮🇳


© Sukanya Yogesh (2026)

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14 August 2026

मौत ही है जीवन की सौत

 


मौत ही है जीवन की सौत


मौत ही है जीवन की सौत,

फिर उससे कैसा डरना है,

जब तक साँसें साथ हमारे,

तब तक हँसते चलना है।


जो आनी है वो आएगी,

जो जानी है वो जाएगी,

आज खिला जो फूल यहाँ है,

कल उसकी पंखुड़ी झर जाएगी।


सौ सौ साल तीव्र गति में,

समय यूँ ही बढ़ता जाएगा,

आज यहाँ जो मानव बैठा,

कल यादों में रह जाएगा।


सुख आए तो हँसकर जी लो,

दुःख आए तो सहते जाओ,

जीवन छोटी सी यात्रा है,

चलते जाओ, बढ़ते जाओ।


क्यों चिंता में आज गँवाएँ,

कल किसने देखा है भाई,

जो अपना है साथ रहेगा,

बाकी सब है आना जाई।


जीवन और मौत का रिश्ता,

कितना गहरा, कितना मौन,

एक हमें दुनिया में लाए,

एक कहे अब लौटो कौन।


मौत अगर जीवन की सौत है,

जीवन भी उससे कम तो नहीं,

जब तक धड़कन दिल में बाकी,

हार मानना हमको नहीं।


जो आनी है वो आएगी,

जो जानी है वो जाएगी,

पर जब तक यह जीवन अपना,

हर पल जीना सिखलाएगी।


© Sukanya Yogesh (2026)


✨ इस कविता के पीछे की कहानी

यह कविता मैंने लगभग 14–15 साल की उम्र में लिखी थी। मुझे यह इतनी पसंद थी कि मैं बड़े गर्व से अपने दोस्तों को सुनाया करती थी। लेकिन जैसे ही मैं शीर्षक बोलती —

“मौत ही है जीवन की सौत”

सब हँस पड़ते! 😂

और मुझे समझ ही नहीं आता था कि इसमें इतना हँसने जैसा क्या है। मेरे किशोर मन में जीवन और मृत्यु की कल्पना बस कुछ ऐसी ही थी।

फिर जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में थी, यानी कॉलेज के First Year में, हमारी हिंदी की टीचर Mrs. Medhkar ने पूछा कि क्लास में कौन-कौन कविता लिखता है। मैंने तुरंत हाथ उठा दिया और अपनी यही कविता उन्हें दे दी।

मेरी कविता चुनी गई और मुझे एक कवि सम्मेलन में इसे सुनाने का अवसर मिला, जहाँ अलग-अलग जगहों से आए लोग अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे थे।

और मुझे आज भी याद है — इस कविता के लिए मुझे ₹100 का पुरस्कार मिला था! 😊🏆

जिस शीर्षक को सुनकर मेरे दोस्त हँसते थे, उसी कविता ने मुझे कवि सम्मेलन के मंच तक पहुँचा दिया!

💭 अब इस शीर्षक को कैसे देखती हूँ?

हाल ही में मैंने ChatGPT से पूछा —

क्या “मौत ही है जीवन की सौत” सच में इतना मज़ेदार शीर्षक है?

और इसका अर्थ समझते हुए मुझे अपने ही बचपन के शब्दों को एक नए नज़रिए से देखने का मौका मिला।

हाँ, “सौत” शब्द सुनकर हँसी आ सकती है। हिंदी में सौत सुनते ही हमारे मन में दूसरी पत्नी या एक ही रिश्ते पर अधिकार रखने वाली दो स्त्रियों की छवि आती है। ऐसे में मौत को जीवन की “सौत” बना देना थोड़ा अप्रत्याशित और नाटकीय तो है ही! 😄

लेकिन शायद इसी में इस पंक्ति की खूबसूरती भी छिपी है।

अगर जीवन और मृत्यु को दो स्त्रियों के रूप में देखें, तो मृत्यु जैसे जीवन की अनिवार्य प्रतिद्वंद्वी है।

जीवन कहता है — अभी यह मेरा है।
मृत्यु कहती है — एक दिन यह मेरे पास आएगा।

जीवन हमें कुछ समय के लिए थामे रखता है। हमें रिश्ते, अनुभव, सुख-दुःख और यादें देता है। और मृत्यु कहीं पृष्ठभूमि में चुपचाप चलती रहती है, क्योंकि एक दिन जीवन जिसे थामे हुए है, उसे छोड़ना ही होगा।

इस अर्थ में जीवन और मृत्यु प्रतिद्वंद्वी होकर भी एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। एक का अस्तित्व दूसरे को अर्थ देता है।

और फिर शायद 14–15 साल की उस लड़की को इतना दर्शन कहाँ सूझा होगा! 😄

मुझे तो शायद बस “मौत” और “सौत” की तुक बहुत अच्छी लगी थी। दोनों में वही “औ” की ध्वनि, वही लय — और उसी rhyme से एक पंक्ति बन गई:

“मौत ही है जीवन की सौत…”

आज सोचती हूँ तो लगता है कि कभी-कभी हम बचपन में केवल शब्दों से खेलते हुए ऐसी बात लिख देते हैं, जिसका अर्थ हमें वर्षों बाद समझ आता है।

इसलिए अब मैं इस शीर्षक को बदलना नहीं चाहूँगी।

इसमें मेरे किशोर मन की कल्पना भी है, मेरे दोस्तों की हँसी भी, Mrs. Medhkar द्वारा दिया गया वह पहला मंच भी, मेरा ₹100 का पुरस्कार भी — और अब, इतने वर्षों बाद, इसमें मुझे दिखाई देने वाला एक नया अर्थ भी। ❤️

“मौत ही है जीवन की सौत,
फिर उससे कैसा डरना है…”


© Sukanya Yogesh (2026)

All rights reserved.

No part of this poetry may be reproduced, distributed, or transmitted in any form or by any means, including photocopying, recording, or other electronic or mechanical methods, without the prior written permission of the author, except in the case of brief quotations used in reviews, articles, or academic work, with proper attribution.

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