14 August 2026

मौत ही है जीवन की सौत

 


मौत ही है जीवन की सौत


मौत ही है जीवन की सौत,

फिर उससे कैसा डरना है,

जब तक साँसें साथ हमारे,

तब तक हँसते चलना है।


जो आनी है वो आएगी,

जो जानी है वो जाएगी,

आज खिला जो फूल यहाँ है,

कल उसकी पंखुड़ी झर जाएगी।


सौ सौ साल तीव्र गति में,

समय यूँ ही बढ़ता जाएगा,

आज यहाँ जो मानव बैठा,

कल यादों में रह जाएगा।


सुख आए तो हँसकर जी लो,

दुःख आए तो सहते जाओ,

जीवन छोटी सी यात्रा है,

चलते जाओ, बढ़ते जाओ।


क्यों चिंता में आज गँवाएँ,

कल किसने देखा है भाई,

जो अपना है साथ रहेगा,

बाकी सब है आना जाई।


जीवन और मौत का रिश्ता,

कितना गहरा, कितना मौन,

एक हमें दुनिया में लाए,

एक कहे अब लौटो कौन।


मौत अगर जीवन की सौत है,

जीवन भी उससे कम तो नहीं,

जब तक धड़कन दिल में बाकी,

हार मानना हमको नहीं।


जो आनी है वो आएगी,

जो जानी है वो जाएगी,

पर जब तक यह जीवन अपना,

हर पल जीना सिखलाएगी।


© Sukanya Yogesh (2026)


✨ इस कविता के पीछे की कहानी

यह कविता मैंने लगभग 14–15 साल की उम्र में लिखी थी। मुझे यह इतनी पसंद थी कि मैं बड़े गर्व से अपने दोस्तों को सुनाया करती थी। लेकिन जैसे ही मैं शीर्षक बोलती —

“मौत ही है जीवन की सौत”

सब हँस पड़ते! 😂

और मुझे समझ ही नहीं आता था कि इसमें इतना हँसने जैसा क्या है। मेरे किशोर मन में जीवन और मृत्यु की कल्पना बस कुछ ऐसी ही थी।

फिर जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में थी, यानी कॉलेज के First Year में, हमारी हिंदी की टीचर Mrs. Medhkar ने पूछा कि क्लास में कौन-कौन कविता लिखता है। मैंने तुरंत हाथ उठा दिया और अपनी यही कविता उन्हें दे दी।

मेरी कविता चुनी गई और मुझे एक कवि सम्मेलन में इसे सुनाने का अवसर मिला, जहाँ अलग-अलग जगहों से आए लोग अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे थे।

और मुझे आज भी याद है — इस कविता के लिए मुझे ₹100 का पुरस्कार मिला था! 😊🏆

जिस शीर्षक को सुनकर मेरे दोस्त हँसते थे, उसी कविता ने मुझे कवि सम्मेलन के मंच तक पहुँचा दिया!

💭 अब इस शीर्षक को कैसे देखती हूँ?

हाल ही में मैंने ChatGPT से पूछा —

क्या “मौत ही है जीवन की सौत” सच में इतना मज़ेदार शीर्षक है?

और इसका अर्थ समझते हुए मुझे अपने ही बचपन के शब्दों को एक नए नज़रिए से देखने का मौका मिला।

हाँ, “सौत” शब्द सुनकर हँसी आ सकती है। हिंदी में सौत सुनते ही हमारे मन में दूसरी पत्नी या एक ही रिश्ते पर अधिकार रखने वाली दो स्त्रियों की छवि आती है। ऐसे में मौत को जीवन की “सौत” बना देना थोड़ा अप्रत्याशित और नाटकीय तो है ही! 😄

लेकिन शायद इसी में इस पंक्ति की खूबसूरती भी छिपी है।

अगर जीवन और मृत्यु को दो स्त्रियों के रूप में देखें, तो मृत्यु जैसे जीवन की अनिवार्य प्रतिद्वंद्वी है।

जीवन कहता है — अभी यह मेरा है।
मृत्यु कहती है — एक दिन यह मेरे पास आएगा।

जीवन हमें कुछ समय के लिए थामे रखता है। हमें रिश्ते, अनुभव, सुख-दुःख और यादें देता है। और मृत्यु कहीं पृष्ठभूमि में चुपचाप चलती रहती है, क्योंकि एक दिन जीवन जिसे थामे हुए है, उसे छोड़ना ही होगा।

इस अर्थ में जीवन और मृत्यु प्रतिद्वंद्वी होकर भी एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। एक का अस्तित्व दूसरे को अर्थ देता है।

और फिर शायद 14–15 साल की उस लड़की को इतना दर्शन कहाँ सूझा होगा! 😄

मुझे तो शायद बस “मौत” और “सौत” की तुक बहुत अच्छी लगी थी। दोनों में वही “औ” की ध्वनि, वही लय — और उसी rhyme से एक पंक्ति बन गई:

“मौत ही है जीवन की सौत…”

आज सोचती हूँ तो लगता है कि कभी-कभी हम बचपन में केवल शब्दों से खेलते हुए ऐसी बात लिख देते हैं, जिसका अर्थ हमें वर्षों बाद समझ आता है।

इसलिए अब मैं इस शीर्षक को बदलना नहीं चाहूँगी।

इसमें मेरे किशोर मन की कल्पना भी है, मेरे दोस्तों की हँसी भी, Mrs. Medhkar द्वारा दिया गया वह पहला मंच भी, मेरा ₹100 का पुरस्कार भी — और अब, इतने वर्षों बाद, इसमें मुझे दिखाई देने वाला एक नया अर्थ भी। ❤️

“मौत ही है जीवन की सौत,
फिर उससे कैसा डरना है…”


© Sukanya Yogesh (2026)

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