18 August 2026

बस छोड़ दो



✨ बस छोड़ दो ✨

सारी उम्र तुम मज़बूत रहे,
देते रहे, सहते रहे,
हर किसी के सहायक बने,
हर उलझन को सुलझाते रहे।

जब भी कोई लड़खड़ाया,
तुमने उसका भार उठाया,
और तुम्हारा पहला ख़याल हमेशा यही रहा,
“मैं संभाल लूँगी… मैं कुछ रास्ता निकाल लूँगी।”

पर जीवन भी धीरे धीरे,
बदलते मौसम और बहती लहरों के साथ
एक बात समझाता है।

हर बात को ठीक करना ज़रूरी नहीं,
हर बात का उत्तर देना ज़रूरी नहीं,
हर उलझन को सुलझाना भी ज़रूरी नहीं।

हर बोझ तुम्हारे कंधों के लिए नहीं बना।
कभी कभी जीवन की सबसे बड़ी समझ बस इतनी सी है,
बस छोड़ दो।

अगर तुमने एक बार अपनी बात कही
और उन्होंने फिर भी नहीं सुनी,
तो उन्हें मनाने में
अपनी आत्मा को मत थकाओ।

एक बार और समझा दो,
फिर विश्वास के साथ पीछे हट जाओ।
अगर वे फिर भी समझना न चाहें,
बस छोड़ दो।

जब तुम्हारे बच्चे बड़े हो जाएँ
और अपने रास्ते स्वयं चुनें,
तो तुम्हारा प्रेम उनके मार्ग का दीपक बने,
पर उनकी राह का निर्णय नहीं।

प्यार से समझाओ,
स्नेह से मार्ग दिखाओ,
फिर एक कदम पीछे हट जाओ।

अपना जीवन चुनना उनका अधिकार है।
बस छोड़ दो।

अगर बहुत कोशिशों के बाद भी
तुम्हारा मन किसी के मन से न मिल पाए,
तो इसे अपनी हार मत समझना।

हर तरंग की अपनी आवृत्ति होती है,
हर आकाश तक हर स्वर नहीं पहुँचता।
रिश्तों को ज़बरदस्ती बाँधने से
केवल मन दुखता है।

जहाँ मन का मेल न हो,
बस छोड़ दो।

किसी की आलोचना के तीखे शब्दों को
अपने ऊपर से गुज़र जाने दो।
मन की शांति इतनी अनमोल है
कि उसे किसी की राय के लिए मत खोओ।

तुमने जीवन की कितनी सर्दियाँ देखी हैं,
कितने अनुभवों की माला पिरोई है।
फिर किसी और की सोच के कारण
अपने भीतर की धूप क्यों कम करना?

बस छोड़ दो।

जब परिणाम तुम्हारे हाथों से
बहुत दूर निकल चुका हो,
तो उसकी चिंता में स्वयं को मत जलाओ।

जो लिखा है, वह होकर रहेगा,
भले ही आज तुम्हें उसका अर्थ समझ न आए।
जिस हाथ ने तारों को थाम रखा है,
उसे आगे का रास्ता भी मालूम है।

बस छोड़ दो।

जब अपेक्षाओं का बोझ
तुम्हारे सीने को झुकाने लगे,
जब तुमसे इतना माँगा जाने लगे
जितना तुम उठा ही नहीं सकते,

तो उस दबाव को मुक्त कर दो।
अपनी आत्मा को थोड़ा विश्राम दो।

तुम जैसे हो,
अपने आप में पर्याप्त हो।

बस छोड़ दो।

अपनी यात्रा अपने ढंग से चलो,
अपनी सहज गति से चलो।
अपनी फसल की तुलना
किसी और के बगीचे से मत करो।

हर किसी की शक्ति अलग है,
हर किसी का मौसम अलग है।
गुलाब की तरह न खिलने से
कोई दूसरा फूल कम सुंदर नहीं हो जाता।

बस छोड़ दो।

तुम्हारे भीतर एक ऐसी संपत्ति है
जिसे कोई हानि तुमसे छीन नहीं सकती।
तुम्हारे अनुभवों का अनमोल सोना,
तुम्हारे जीवन की अर्जित समझ।

फिर हर दिन के लाभ और हानि से
अपनी कीमत क्यों आँकना?

तुम्हारा मूल्य पहले से ही तुम्हारे भीतर है।
बस छोड़ दो।

जो कुछ भी जीवन में घट रहा है,
उसमें कहीं न कहीं उसकी योजना है।

न कोई साँस व्यर्थ है,
न कोई पत्ता यूँ ही हिलता है,
न कोई क्षण उसकी दृष्टि से बाहर है।

जिसे बदल नहीं सकते, उसे स्वीकार करो।
जिसे बेहतर कर सकते हो, उसे बेहतर करो।
और जो तुम्हारे हाथों में नहीं है,
उसे प्रभु के हाथों में सौंप दो।

बस छोड़ दो।

और अगर ये शब्द भी
तुम्हारे मन तक नहीं पहुँचते,
अगर तुम्हें लगता है
कि ये बातें तुम्हारे लिए नहीं हैं,

तो इन्हें भी प्रेम से एक ओर रख देना।

बस एक आख़िरी बात,
और फिर पूर्ण मौन।

अगर यह संदेश तुम्हारे लिए नहीं है…

तो इसे भी… बस छोड़ दो। ✨



© Sukanya Yogesh (2026)

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