औरत कब अपने लिए जीती है?
कभी बेटी बन घर को महकाती,
कभी बहन बन स्नेह लुटाती,
कभी पत्नी बन रिश्ते सँवारती,
कभी माँ बन संसार निखारती।
सबकी इच्छा का मान रखती,
सबके सुख का ध्यान रखती,
सबके सपनों को पंख लगाती,
पर अपने सपने भूलती जाती।
पढ़ी लिखी है, हुनर भी है,
उसके भीतर सामर्थ्य भी है,
फिर क्यों उसकी हर प्रतिभा
कर्तव्यों में ही खो जाती है?
उसकी शिक्षा व्यर्थ नहीं है,
उसका हुनर भी कम नहीं है,
वह चाहे तो अपनी प्रतिभा से
जग में नया उजियारा भर दे।
अपने ज्ञान को आगे बढ़ाए,
अपने हुनर से राह बनाए,
खुद भी बढ़े और साथ ही अपने
घर और समाज को बेहतर बनाए।
अपने सपनों को जीना भी
कोई स्वार्थ की बात नहीं,
सबके लिए जीते जीते
खुद को खोना त्याग नहीं।
वह केवल रिश्तों का नाम नहीं,
वह त्याग की बस पहचान नहीं,
उसकी भी अपनी एक हस्ती है,
उसके सपनों की भी बस्ती है।
कब तक सबसे पीछे रहकर
मन की इच्छाएँ दबाएगी?
जिस दिन खुद को चुनना सीखेगी,
उस दिन सच में जी पाएगी।
सबका हाथ थामे, मगर
अपना साथ कभी न छोड़े,
अपनी शिक्षा, अपनी प्रतिभा से
सफलता के नए द्वार खोले।
औरत जब अपने लिए जिएगी,
तभी तो सच में खिल पाएगी,
खुद रोशन होकर वह दुनिया में
कितने दीप जला पाएगी।
© Sukanya Yogesh (2026)
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